शहीद-ए-आज़म
सरदार भगत सिंह
✦ इंकलाब ज़िंदाबाद ✦
🇮🇳 मूल परिचय
भगत सिंह (पूरा नाम: भगत सिंह संधू) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे महान क्रांतिकारियों में से एक थे। उन्हें शहीद-ए-आज़म (शहीदों में सर्वश्रेष्ठ) की उपाधि दी जाती है। मात्र 23 वर्ष की आयु में उन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपना बलिदान दे दिया।
👨👩👧👦 परिवार एवं प्रारंभिक जीवन
भगत सिंह का जन्म एक जाट सिख परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह संधू और माता का नाम विद्यावती कौर था। उनके दादा सरदार अर्जन सिंह और चाचा अजीत सिंह व स्वर्ण सिंह भी स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय थे। जन्म के समय उनके पिता और चाचा अंग्रेज़ों के विरुद्ध आंदोलन के कारण जेल में थे।
13 अप्रैल 1919 को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने मात्र 12 वर्षीय भगत सिंह के मन-मस्तिष्क को झकझोर दिया। वे अमृतसर गए, वहाँ की रक्त-रंजित मिट्टी एक बोतल में भरकर लाए और देश को आज़ाद कराने का संकल्प लिया।
📚 शिक्षा एवं विचारधारा
भगत सिंह ने दयानंद एंग्लो-वैदिक (डी.ए.वी.) हाई स्कूल, लाहौर में शिक्षा प्राप्त की। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के आह्वान पर उन्होंने सरकारी स्कूल छोड़ दिया और नेशनल कॉलेज, लाहौर (लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित) में प्रवेश लिया।
वे मार्क्सवाद, समाजवाद और अराजकतावाद से प्रभावित थे। उन्होंने कई भाषाएँ सीखीं — हिंदी, पंजाबी, उर्दू, अंग्रेज़ी, संस्कृत। जेल में उन्होंने प्रसिद्ध निबंध «मैं नास्तिक क्यों हूँ?» लिखा। उनकी जेल नोटबुक आज भी क्रांतिकारी विचारों का खजाना है।
⚔️ क्रांतिकारी संगठन
- नौजवान भारत सभा (1926) — युवाओं को क्रांति के लिए संगठित करने वाला संगठन, जिसके वे सचिव रहे।
- हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एच.आर.ए.) में शामिल हुए।
- 1928 में उन्होंने इसे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एच.एस.आर.ए.) नाम दिया — समाजवाद को जोड़कर। चंद्रशेखर आज़ाद, सुखदेव, राजगुरु उनके प्रमुख साथी थे।
- कीर्ति किसान पार्टी से भी जुड़े और क्रांतिकारी साहित्य लिखा।
🔥 प्रमुख क्रांतिकारी घटनाएँ
साइमन कमीशन के विरोध में लाला लाजपत राय पर हुए बर्बर लाठीचार्ज के बाद उनकी मृत्यु हो गई। बदला लेने के लिए भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने पुलिस अधीक्षक जेम्स स्कॉट को निशाना बनाया, पर गलती से जॉन पी. सॉन्डर्स की हत्या हो गई।
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में बम फेंके। उद्देश्य हत्या नहीं, बल्कि «बहरे को सुनाने के लिए जोर से आवाज़» करना था। बम फेंकने के बाद वे भागे नहीं, बल्कि «इंकलाब ज़िंदाबाद» के नारे लगाते हुए गिरफ्तार हो गए।
जेल में उन्होंने राजनीतिक कैदियों के सम्मानजनक व्यवहार की माँग को लेकर लंबी भूख हड़ताल की (लगभग 116 दिन तक)। इससे पूरे देश में उनकी लोकप्रियता बढ़ गई।
लाहौर षड्यंत्र केस में फाँसी की सज़ा सुनाई गई। अंग्रेज़ों ने निर्धारित समय से लगभग 11 घंटे पहले भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर सेंट्रल जेल में फाँसी दे दी। वे अंतिम क्षण तक हँसते हुए «इंकलाब ज़िंदाबाद» के नारे लगाते रहे।
💬 अमर उद्धरण
🌟 विरासत एवं स्मृति
हर वर्ष 23 मार्च को पूरे भारत में शहीद दिवस (Martyrs' Day) मनाया जाता है। हुसैनीवाला (पंजाब) में राष्ट्रीय शहीद स्मारक स्थापित है, जहाँ भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की अस्थियाँ रखी गईं।
उनकी विचारधारा — समाजवाद, समानता, अंधविश्वास के विरुद्ध तर्क और युवाओं में क्रांति की भावना — आज भी प्रेरणा का स्रोत है। नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और अनगिनत युवाओं ने उन्हें अपना आदर्श माना।
